वृहस्पति देव की कहानी



                   वृहस्पति देव की कहानी
                                               
                                                कहानी 


kahaniएक बार पुराने समय की बात है ! एक ब्राह्मण रहता था ! वह बहुत ही गरीब था और उसके कोई पुत्र या पुत्री नहीं थी ! और उसकी पत्नी का आचरण बहुत बुरा था ! वह न तो स्नान करती थी ! और न ही किसी देवताओ की पूजा करती थी ! वह रोजना प्रात: काल उठते ही सबसे पहले खाना खाया करती थी और उसके बाद ही घर में  कोई अन्य कार्य करती थी ! पत्नी के आचरण से वह ब्राह्मण बहुत दुखी थे ! और पत्नी को बहुत समझाया परन्तु पत्नी पर उसकी बातो का कोई असर नहीं पड़ा ! एक दिन भगवन की क्रपा से ब्राह्मण की पत्नी के कन्या का जन्म हुआ ! और वह ब्राह्मण के घर ही बड़ी होने लगी !



वह लड़की सुबह के समय में स्नान आदि करके विष्णु भगवन की पूजा व भगवान का नाम जाप  करने लगी और उसके अलावा वृहस्पतिवार का व्रत करने लगी ये सब काम करने के बाद स्कूल जाती और थोड़े जौ अपने साथ ले जाती और स्कूल के मार्ग में डालती जाती थी ! और वापस आती तो वे जौ सोना के हो जाते थे ! उसको वह बीनकर घर ले आती थी ! एक बार वह लड़की सूप में जौ को फटक कर  साफ कर रही थी तो उसकी माँ ने देखा की सोने के जौ है और उसको कहा -  बेटी सोने के जौ को   फटक कर साफ करने के लिए सोने का सूप होना चाहिये ! 


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तो दूसरे दिन गुरुवार था और उस लड़की ने गुरुवार का व्रत रखा और वृहस्पति देव से कहने लगी की हे देव मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की है ! आप मुझ पर क्रपा करके मुझे सोने का सूप दे दो ! वृहस्पति देव ने भी उस लड़की की प्रार्थना स्वीकार कर ली रोजाना की तरह वह लड़की स्कूल जाती और मार्ग में जौ फैलाती जाती और पाठ शाला से वापस आती और रास्ते में जो जौ सोने के हो जाते उसे बीन रही थी ! उस दिन श्री वृहस्पति देव की क्रपा हुई उसे सोने का सूप मिल गया और उसे वह घर ले आई और उससे वह जौ साफ करने लगी तो उसकी माँ का ढंग वही रहता था ! 

एक दिन की बात थी जब वह रोजाना की तरह ही सोने के सूप से जौ साफ कर रही थी उसी समय ही उस नगर का राजा का पुत्र वहा से होकर निकला ! राजा का पुत्र उस लड़की का रूप और उसके कार्य को देखकर उससे मोहित हो गया और राज महल में आकार ना तो खाना खाया ना ही पानी पिया और उदास रहने लगा ! राजा को इस बात का पता लगा की उसका पुत्र उदास रहता है !  तो राजा ने अपने प्रधान मंत्रियो के साथ अपने पुत्र के पास गए ! और कहने लगे की पुत्र तुम्हे क्या समस्या है क्या किसी ने आपका अपमान किया है ! या और कोई कारण है तो मुझे बताये मै खुशी से आपका समाधान करुगा ! 

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राजकुमार अपने पिता की बाते सुन रहा था और बोला की पिताजी आपकी क्रपा से मुझे कोई दुःख नहीं है ! और न ही किसी ने मेरा अपमान किया है ! किन्तु मै उस लड़की से विवाह करुगा की जो सोने के सूप में जौ साफ करती है ! राजा अपने पुत्र की बात सुन कर आश्चर्य चकित हुआ और बोला बेटे उस लड़की का पता तो तुम लगाओ और मै अवश्य ही आपका विवाह उसी लड़की के साथ कर दूंगा ! राजा के पुत्र ने उस लड़की के घर का पता बताया और मंत्री उस लड़की के घर गए और ब्रहामण की लड़की के साथ उस राज कुमार का विवाह करवा दिया !

उस ब्रहामण की पुत्री राजकुमार के साथ चली गई ! अब उस ब्रहामण के घर पर पहले जैसी स्थिति आ गई और पहले की तरह ही गरीब हो गया ! और भोजन के लिए अन्न भी मिलना दूर हो गया एक दिन ब्राहमण दुखी होकर अपनी पुत्री के पास गया ! पिता को दुखी देखकर बेटी ने अपनी माँ के बारे में बताई तब पिता ने भी पूरा हाल बताया ! उस लड़की में बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया ! इस तरह से ब्रहामण के कुछ दिन सुखी से बित गए ! और कुछ दिनों के बाद लड़की के पिता की स्थिति वही दुबारा से अपनी पुत्री के गया और अपना सारा हाल उसे बताया तो लड़की बोली की पिताजी आप मेरी माँ को यहाँ लेकर आओ मै उसे विधि बताती हूँ ! जिससे गरीबी दूर हो जायेगी ! तब वह ब्राहमण अपनी पत्नी को लेकर अपनी पुत्री के घर गया और पुत्री अपनी को कहने लगी की माँ आप सूबह जल्दी उठ कर स्नान आदि कार्य करके भगवान विष्णु का पूजन करो जिससे ही सारी गरीबी दूर होती है ! किन्तु उसकी माँ ने उसकी बात ना मानी और सूबह उठकर पुत्री बच्चे का झूठन खा लेती थी ! एक रात उसकी पुत्री को बहुत गुस्सा आया एक कमरे में से सारा सामान निकला दी !

और अपनी माँ को उस कमरे में बंद कर दी सुबह होते ही उसको स्नान आदि करवा के उससे पूजा पाठ करवाया तो उसकी बुद्धि सही हो गई और फिर हर वृहस्पतिवार को व्रत करने लगी ! तो उस व्रत के प्रभाव से उसकी माँ भी बहुत धनवान और पुत्र वान हो गई ! और वृहस्पति देव की क्रपा से  वे दोनोँ ब्राहमण व उसकी पत्नी इस लोक में सुख भोगकर अंत स्वर्ग को प्राप्त हुए ! इस तरह से कहानी कहकर साधू देवता वहा से लोप हो गए ! धीरे - धीरे समय गुजरता गया फिर वृहस्पतिवार का दिन आया राजा जंगल से लकड़ी काट कर किसी शहर में बेचने के लिए गया ! उस दिन उसे ओर दिनों से अधिक धन मिला राजा ने गुड़ चना आदि सामान लाकर वृहस्पतिवार का व्रत किया ओर व्रत के प्रभाव से राजा के सभी दुःख दूर हो गए ! जब अगली बार  वृहस्पतिवार का दिन आया तो राजा व्रत करना भूल गया इस पर  वृहस्पतिवार  देव नाराज हो गए ! उस दिन नगर का राजा विशाल यज्ञ का आयोजन किया ओर नगर में यह भी घोषणा करवा दिया की कोई भी अपने घर खाना ना बनाये बल्कि राजा के ही घर सब भोजन करके जावे ! और जो आदमी भोजन करने नहीं आएगा तो उसको फाँसी की सजा भुगती पड़ेगी ! 

नगर के सभी लोग भोजन करने गए लेकिन एक लकड़हारा देरी से पहुचे तो राजा ने उसे अपने साथ लेकर घर गए ! और उसे भोजन करवा रहे थे ! तब रानी आई तो उसने देख खूंटी पर से तो हार गायब है ! और रानी ने निश्चय किया की वह हार उस आदमी ने चुरा लिया है और सिपाही को बुलाकर उसे जेल में डलवा दी ! तो राजा जेल खाने में बहुत दुखी हुआ और सोचने लगा की मेरे  पूर्व जन्म के कर्म से दुःख प्राप्त हुआ है ! 

और जंगल में लकड़ी काटते समय जो साधू मिला था उसको राजा याद करने लगा ! तब  वृहस्पतिवार देव उस राजा के पास साधू के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे की मुर्ख आपने  वृहस्पतिवार के दिन  वृहस्पति देव की कथा नहीं की इस कारण तुम्हे दुःख प्राप्त हुआ है ! अब आप चिंता ना कर वृहस्पतिवार के दिन जेल के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेगे ! और आप वृहस्पतिवार का व्रत करे आपका सारा दुःख दूर होगा ! तब उस राजा को  वृहस्पतिवार के दिन रोज चार पैसे पड़े मिलते ! राजा वृहस्पतिवार देव की कथा की उस रात्रि को वृहस्पतिवार देव उस नागर के राजा को स्वप्न में आये और कहा की हे राजा आपने जिस आदमी को जेल में बंद किया है वह आदमी तो निरपराधी है ! और उसे तुम छोड़ देना और तुम्हारी रानी का हार उस खूंटी के टांका हुआ मिलेगा ! राजा रानी के उस हार को देखकर उस आदमी से क्षमा मागी और उसे  बहुत सा धन देकर उसे विदा कर दिया ! 

वह गुरुदेव की आज्ञा से राजा जब अपने नगर के निकट पहुचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ नगर में पहले से अधिक बाग तालाब कुए बावड़ी व धर्मशाला मंदिर आदि बने हुए थे ! तब राजा में पूछा ये सब किसके है ! तब नगर वासी कहने लगे ये सब रानी और बांदी के है ! इस पर राजा के आश्चर्य भी हुआ और गुस्सा भी आया ! जब रानी यह समाचार सुनती है की राजा आ रहे तब रानी अपनी दासी बांदी से कहा की राजा हमें कितनी बुरी हालत में छोड गए है ! और राजा हमारी हालत देखकर वापस ना चला जाये उसके लिए आप दरवाजे के पीछे खड़ी हो जावो तो वह बांदी दासी दरवाजे के पीछे खड़ी हो गई ! और राजा आया तो राजा को अपने साथ ले आई ! राजा क्रोध में तलवार निकाली और बांदी दासी से कहा ये धन आपको कैसे मिला तब दासी बोली की ये धन तो वृहस्पति देव के व्रत के प्रभाव से मिला !

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राजा ने सोचा की लोग तो सप्ताह में एक बार व्रत करते है ! मै तो रोजाना दिन में तीन बार कहानी कहूँगा और रोज ही व्रत किया करुगा ! जबसे राजा हर समय अपने दुपटे चने की दाल रखने लगा ! और वो दिन में तीन बार वृहस्पति देव की कहानी कहने लगा ! और एक दिन राजा अपनी बहन के जाने की सोचा फिर राजा घोड़े पर सवार होकर अपनी बहन के गया मार्ग में कुछ आदमी मुर्दे को लिए हुए जा रहे थे ! उस आदमियों को राजा ने रोक कर कहा की मेरी वृहस्पति देव की कहानी सुन लो उसमे से कुछ आदमी बोले की हम तो मुर्दे को लेकर जा रहे है ! कुछ बोले की हम आपकी कहानी सुनेगें तब राजा में दल निकाली और कहानी शुरू की आधी कहानी हुई तो मुर्दा हिलने लगा और कहानी पूरी हुई तो वह खड़ा होकर राम राम करने लगा !

आगे मार्ग में खेत में हल जोतता एक किसान मिला तब राजा ने उसे कहा की आप मेरे वृहस्पति देव की कहानी सुनो तब किसान ने बोला मेरे पास तो समय नहीं है कहानी सुनुगा उतनी देर में तो चार चक्कर हल के जोतुगा ! और किसान ने कहा की कहानी किसी और को सुनाओ हमारे पास समय नहीं है ! तब राजा आगे निकाल गया तो किसान का बैल गिर गया और किसान के बहुत जोर से उसके पेट में दर्द होने लगा ! उसी समय उसकी माँ उसके लिए रोटी लेकर आई तो वो हाल देख कर वह तो राजा के पीछे - पीछे दोड़ी और उसको कही की मै आपकी कहानी सुनुगी आप मेरे खेत में चलकर सुनाये !  तब राजा खेत में जाकर कहानी सुनाया तो किसान का पेट दर्द भी ठीक हो गया और बैल भी सही हो गया फिर राजा अपनी बहन के घर पंहुचा तो उसका खूब मेहमानी हुई  दूसरे दिन राजा देखा यहाँ के लोग सबसे पहले भोजन ही करते है ! तब वह अपनी बहन से बोला की कोई ऐसा आदमी है ! जो अब तक भोजन नहीं किया है ! वो मेरी वृहस्पति देव की कहानी सुन ले ! बहन बोली की की यहाँ के लोग तो पहले भोजन करते है फिर कोई अन्य काम करते है ! पर मै आस - पास कोई देख लू वह ऐसे आदमी को देखने के लिए चल गई और उसे ऐसा आदमी जो भोजन नहीं किया हुआ हो वह नहीं मिला अंत में कोई कुम्हार के घर एक लड़का तीन दिन से बीमार था ! और तीन दिन से खाना भी नहीं खाया हुआ था ! तब उस राजा की बहन ने कहा की मेरे भाई से आप वृहस्पति देव की कहानी सुने ! कहानी सुनने के बाद वह लड़का ठीक हो गया ! और राजा की प्रशंसा होने लगी !

एक दिन राजा अपनी बहन से बोला की मै अपने घर जा रहा हू आप भी हमारे साथ चले और उसकी सास ने भी हाँ कर दी और यह कहा की अपने बच्चे के मत ले जाना आपके भाई के कोई संतान नहीं है ! बहन अपने भाई राजा से बोली की बच्चे नहीं चलेगें केवल मै ही चलुगी तब वह राजा बोला बच्चे नहीं चलेगे तो आप चल कर क्या करोगी ! राजा बहुत दुखी मन से अपने नगर को आया ! 




अपने नगर में आकार राजा अपनी रानी से कहता है की हम निर वंसी राजा है अब हमारा मुह देखने का कोई धर्म नहीं है ! और हम भोजन आदि भी नहीं करेगें ! तब राजा की रानी बोली की वृहस्पति देव हमें सब कुछ दिया है और हमें संतान भी देगे ! उसी रात ही वृहस्पति देव राजा से स्वप्न में बोले अब आप पुत्र वान हो गए ! अपने मन के सब बुरे विचार त्याग दे ! 

राजा और रानी बहुत खुश हुए ! तब रानी के नवें महीने एक सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ ! राजा अपनी रानी से बोला हे रानी स्त्री भोजन के बिना रह सकती है कहे बिना नहीं रह सकती आप मेरी बहन को कुछ मत कहना तब रानी ने राजा की बात स्वीकार कर ली !

जब राजा की बहन ने शुभ समाचार मिला तो वह बधाई लेकर अपने भाई राजा के पास आई तब रानी उस राजा की बहन को कहा की आप घोड़े चढ़ तो नहीं गधा चढ़ आई हो और राजा की बहन बोली की भाई मै ऐसा नहीं कहती तो आपको संतान कैसे मिलती ! और वृहस्पति देव की कथा सुनने से उसकी क्रपा से ही सारी मनोकामना पूरी होती है ! और वह सदैव ही अपने भक्तो की रक्षा करते है ! और राजा रानी ने भी सच्ची भावना से ही वृहस्पति देव का गुण गान किया था ! तथा राजा और रानी की सब इच्छाएं पूरी हुई है ! इस लिए कथा या कहानी सुनने के बाद प्रसाद लेना चाहिये ! और मन में वृहस्पति देव का गुण गान करना चाहिये और सच्चे मन से करना चाहिए !

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